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तन्हा-तन्हा सा हूँ मैं

कुमार किशन कीर्ति



भीड़ में भी तन्हा हूँ
महफिल में भी अकेला हूँ
मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ
बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ
जीवन की कुछ इच्छाए अधूरी हो गई हैं
जैसे मेरी प्रेयसी मुझसे दूर हो गई है
अंधेरों में भी उजालों की तलाश करता हूँ
अपनी अतीत में भी कभी खो जाता हूँ
मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ
बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ
तन्हाई से अब मुझे प्यार हो गया है
जैसे, किसी शराबी को मदिरा भा गया है
जीवन की सच्चाई अब समझ में आने लगी है
किसी 'और' के बिना जिंदगी
सुनी-सुनी हो गई है
मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ
बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ

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