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Showing posts from October, 2019

हालात- ए-हिंद

अखिलेन्द्र राज सामर्थ्यवान संपूज्य जगत मे पूज्य कहा निर्बल है वह कहलाता उतना महान जिसमे जितना बल है निर्बल की करूण वेदना सुन किसका अब खून खौलता है हर तरफ दुशासन दुर्योधन नारी का जिस्म तौलता है अब कहाँ बचा है धर्म और इमान कहाँ अब जिंदा है पावनतम् भारत भूमि पर जब जिस्म बेचना धंधा है कोई भूखा तड़प रहा है घर मे दो दो रोटी को तरस रहा है कोई बच्चा तन पर एक लंगोटी को कागज और कलम मे दिखता हो भारत कुछ और भले असली भारत आज अभी भी दबा हुआ है भूख तले कोरे कागज  मे विकास के कालम बेशक पूरे है लेकिन बस ये कालम भर है आगे सभी अधूरे है मात्र कल्पना नही सत्य यह भारत की असली सूरत है महलों से यह नही दिखेगी यह जमीन की वह मूरत है चीख रही है द्रुपद सुता और भूख खा रही जान उठा लेखनी कैसे  लिख दूँ भारत देश महान

हालत-ए-समाचार

अखिलेन्द्र राज आवाम की आवाज को कैसे दबाया जा रहा है चंद टुकड़ो के लिये, गुण गान गाया जा रहा है दीखनी चहिये जहा हालात हिंदुस्तान की देखिये साहब वहाँ क्या क्या दिखाया जा रहा है भुखमरी बेरोजगारी खेत मे मरता  किसान छोड़िये महलों को आकर देखिये हिंदोस्तान आइये फिर देखिये हालात उस इंसान का लोग कहते है जिसे भगवान हिंदुस्तान का जो ब्यवस्था कर रहा है शहर के पकवान का सूखी रोटी से है लगता भोग उस भगवान का सेठ साहूकार की फटकार जिसकी जिंदगी है और उसका पूर्ण जीवन उन पगों की बंदगी है बेटियाँ होती जवां इसकी भी उसको फिक्र है इस खबर की  सिर्फ और बस सिर्फ उसको जिक्र है इस खबर को कोई भी अखबार लायेगा नही और न ही किसी चैनल पर ये छायेगा कही क्योकि इस खबर मे कोई मसाला नही है और इस पे कोई खास टीआरपी मिलने वाला नही है इसकी खबर सिर्फ उस इंसान के दिमाग पर चलती है जिसमे हिंदुस्तान की असली तस्वीर पलती है यह एक छोटी सी खबर है जिस से टी.बी. और अखबार दोनो बेखबर है यह कोई खास खबर नही पल रही है , ऐसी बहुत सी खबरे हिंदुस्तान मे चल रही है, लेकिन उनपे कोई खास टीआरपी मिलने वाला नही है,...

पिता

कुमार किशन कीर्ति एक वृक्ष की तरह होते हैं पिता विघ्न-बाधा को झेलकर कुटुम्ब को पालते हैं पिता सारी समस्याओं को सुलझाकर चेहरें पर हँसी लाते हैं पिता अपनी अभिलाषाओं को दबा...

पत्थर की नारी हो  तो

सुरिंदर कौर पत्थर की नारी हो  तो पूजे है सब कोई। हांड माँस की नारी देखे, तो जाने क्या होई। वैसी ही है वो तो रे जैसे तेरी माँ, बहना। लूटे लाज उसी की, और तुझे क्या कहना। छोटी छोटी ...

नीरव प्रतिध्वनि

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी हॉल तालियों से गूँज उठा, सर्कस में निशानेबाज की बन्दूक से निकली पहली ही गोली ने सामने टंगे खिलौनों में से एक खिलौना बतख को उड़ा दिया था। अब उसने दूसरे निशाने की तरफ इशारा कर उसकी तरफ बन्दूक उठाई। तभी एक जोकर उसके और निशानों के बीच सीना तान कर खड़ा हो गया।   निशानेबाज उसे देख कर तिरस्कारपूर्वक बोला, "हट जा।" जोकर ने नहीं की मुद्रा में सिर हिला दिया। निशानेबाज ने क्रोध दर्शाते हुए बन्दूक उठाई और जोकर की टोपी उड़ा दी। लेकिन जोकर बिना डरे अपनी जेब में से एक सेव निकाल कर अपने सिर पर रख कर बोला “मेरा सिर खाली नहीं रहेगा।” निशानेबाज ने अगली गोली से वह सेव भी उड़ा दिया और पूछा, "सामने से हट क्यों नहीं रहा है?" जोकर ने उत्तर दिया, "क्योंकि... मैं तुझसे बड़ा निशानेबाज हूँ।" "कैसे?" निशानेबाज ने चौंक कर पूछा तो हॉल में दर्शक भी उत्सुकतावश चुप हो गए। “इसकी वजह से...” कहकर जोकर ने अपनी कमीज़ के अंदर हाथ डाला और एक छोटी सी थाली निकाल कर दिखाई। यह देख निशानेबाज जोर-जोर से हँसने लगा। लेकिन जोकर उस थाली को दर्शकों को दिखा कर बोला...

जीत

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी "यह मार्मिक छायाचित्र हमारे देश के उच्च कोटि के फोटोग्राफर रोशन बाबू ने लिया है, इसमें पंछियों के जोड़े में से एक की मृत्यु हो गयी है और दूसरा चीत्कार कर रहा है।“  नेपथ्य से आती आवाज़ के साथ मंच में पीछे रखी बड़ी सी स्क्रीन पर रोते हुए एक पंछी का चित्र दिखाई देने लगा जिसका साथी मरा हुआ पड़ा था। अब फिर से आवाज़ गूंजी, “मित्रों, यह लव-बर्ड हैं, इनके जोड़े में से जब कोई भी एक पंछी मर जाता है, तो दूसरा भी जीवित नहीं रह सकता। एक सच्चा कलाकार ही इस दर्द का चित्रण कर सकता है। निर्णायकों द्वारा इसी चित्र को इस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ छायाचित्र घोषित किया गया है। रोशन बाबू को बहुत बधाई।"  घोषणा होते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो उठा, रोशन बाबू का पिछले कई वर्षों का सपना पूरा हो गया था, और उनकी ख़ुशी का पारावार नहीं था। हॉल में पहली पंक्ति पर बैठा रोशन बाबू के परिवार के हर सदस्य का चेहरा खिल उठा था, लेकिन वह चित्र देखते ही वहीँ बैठी उनकी बेटी की भी रुलाई छूट गयी। तीन महीने तक वह उन पंछियों के साथ खेली थी, और एक दिन रोशन बाबू ने उनमें से एक का गला ...

पहचान

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी उस चित्रकार की प्रदर्शनी में यूं तो कई चित्र थे लेकिन एक अनोखा चित्र सभी के आकर्षण का केंद्र था। बिना किसी शीर्षक के उस चित्र में एक बड़ा सा सोने का हीरों जड़ित सुंदर दरवाज़ा था जिसके अंदर एक रत्नों का सिंहासन था जिस पर मखमल की गद्दी बिछी थी।उस सिंहासन पर एक बड़ी सुंदर महिला बैठी थी, जिसके वस्त्र और आभूषण किसी रानी से कम नहीं थे। दो दासियाँ उसे हवा कर रही थीं और उसके पीछे बहुत से व्यक्ति खड़े थे जो शायद उसके समर्थन में हाथ ऊपर किये हुए थे। सिंहासन के नीचे एक दूसरी बड़ी सुंदर महिला बेड़ियों में जकड़ी दिखाई दे रही थी जिसके वस्त्र मैले-कुचैले थे और वो सर झुका कर बैठी थी। उसके पीछे चार व्यक्ति हाथ जोड़े खड़े थे और कुछ अन्य व्यक्ति आश्चर्य से उस महिला को देख कर इशारे से पूछ रहे थे "यह कौन है?" उस चित्र को देखने आई दर्शकों की भीड़ में से आज किसी ने चित्रकार से पूछ ही लिया, "इस चित्र में क्या दर्शाया गया है?" चित्रकार ने मैले वस्त्रों वाली महिला की तरफ इशारा कर के उत्तर दिया, "यह महिला जो अपनी पहचान खो रही है..... वो हमारी मातृभाषा है...." अगल...

मानव-मूल्य

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी वह चित्रकार अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति को निहार रहा था। चित्र में गांधीजी के तीनों बंदरों  को विकासवाद के सिद्दांत के अनुसार बढ़ते क्रम में मानव बनाकर दिखाया गया था। उसके एक मित्र ने कक्ष में प्रवेश किया और चित्रकार को उस चित्र को निहारते देख उत्सुकता से पूछा, "यह क्या बनाया है?" चित्रकार ने मित्र का मुस्कुरा कर स्वागत किया फिर ठंडे, गर्वमिश्रित और दार्शनिक स्वर में उत्तर दिया, "इस तस्वीर में ये तीनों प्रकृति के साथ विकास करते हुए बंदर से इंसान बन गये हैं, अब इनमें इंसानों जैसी बुद्धि आ गयी है। ‘कहाँ’ चुप रहना है, ‘क्या’ नहीं सुनना है और ‘क्या’ नहीं देखना है, यह समझ आ गयी है। अच्छाई और बुराई की परख - पूर्वज बंदरों को ‘इस अदरक’ का स्वाद कहाँ मालूम था?" आँखें बंद कर कहते हुए चित्रकार की आवाज़ में बात के अंत तक दार्शनिकता और बढ़ गयी थी।  "ओह! लेकिन तस्वीर में इन इंसानों की जेब कहाँ है?" मित्र की आवाज़ में आत्मविश्वास था। चित्रकार हौले से चौंका, थोड़ी सी गर्दन घुमा कर अपने मित्र की तरफ देखा और पूछा, "क्यों...? जेब किसलिए?" मित्र न...

बाढ़ से बचाव के लिये नदियां गहरी की जावें

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र पानी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। सारी सभ्यतायें नैसर्गिक जल स्रोतो के तटो पर ही विकसित हुई हैं। बढ़ती आबादी के दबाव में , तथा ओद्योगिकीकरण से पानी की मांग बढ़ती ही जा रही है। इसलिये भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है और परिणाम स्वरूप जमीन के अंदर पानी के स्तर में लगातार गिरावट होती जा रही है। नदियो पर हर संभावित प्राकृतिक स्थल पर बांध बनाये गये हैं। बांधो की ऊंचाई को लेकर अनेक जन आंदोलन हमने देखे हैं। बांधो के दुष्परिणाम भी हुये , जंगल डूब में आते चले गये और गांवो का विस्थापन हुआ। बढ़ती पानी की मांग के चलते जलाशयों के बंड रेजिंग के प्रोजेक्ट जब तब बनाये जाते हैं।  रहवासी क्षेत्रो के अंधाधुन्ध सीमेंटीकरण , पालीथिन के व्यापक उपयोग तथा कचरे के समुचित डिस्पोजल के अभाव में , हर साल तेज बारिश के समय या बादल फटने की प्राकृतिक घटनाओ से शहर , सड़कें बस्तियां लगातार डूब में आने की घटनायें बढ़ी हैं। विगत वर्षो में ...