अखिलेन्द्र राज सामर्थ्यवान संपूज्य जगत मे पूज्य कहा निर्बल है वह कहलाता उतना महान जिसमे जितना बल है निर्बल की करूण वेदना सुन किसका अब खून खौलता है हर तरफ दुशासन दुर्योधन नारी का जिस्म तौलता है अब कहाँ बचा है धर्म और इमान कहाँ अब जिंदा है पावनतम् भारत भूमि पर जब जिस्म बेचना धंधा है कोई भूखा तड़प रहा है घर मे दो दो रोटी को तरस रहा है कोई बच्चा तन पर एक लंगोटी को कागज और कलम मे दिखता हो भारत कुछ और भले असली भारत आज अभी भी दबा हुआ है भूख तले कोरे कागज मे विकास के कालम बेशक पूरे है लेकिन बस ये कालम भर है आगे सभी अधूरे है मात्र कल्पना नही सत्य यह भारत की असली सूरत है महलों से यह नही दिखेगी यह जमीन की वह मूरत है चीख रही है द्रुपद सुता और भूख खा रही जान उठा लेखनी कैसे लिख दूँ भारत देश महान