Skip to main content

ये सड़कें ये पुल ही नही सारा सरकारी माल अपना

विवेक रंजन श्रीवास्तव



रेल के डिब्बे के दरवाजो के ऊपर लिखा उद्घोष वाक्य  "सरकारी संपत्ति आपकी अपनी है", का अर्थ देश की जनता को तरह समझ आ चुका  है यही कारण है कि भीड़ के ये चेहरे जो इस माल असबाब के असल मालिक हैं, शौचालय में चेन से बंधे मग्गे और नल की टोंटी की सुरक्षा के लिये खाखी वर्दी तैनात होते हुये भी गाहे बगाहे अपनी साधिकार कलाकारी दिखा ही देते हैं ऐसा नही है कि यह प्रवृत्ति केवल हिन्दोस्तान में ही हो, इंग्लैंड में भी हाल ही टाइलेट से पूरी सीट ही चोरी हो गई, ये अलग बात है कि वह सीट ही चौदह कैरेट सोने की बन हुई थी किन्तु थी तो सरकारी संपत्ति ही, और सरकारी संपत्ति की मालिक जनता ही होती है वीडीयो कैमरो को चकमा देते हुये सीट चुरा ली गई

हम आय का ३३ प्रतिशत टैक्स देते हैं हमारे टैक्स से ही बनती है सरकारी संपत्ति मतलब पुल, सड़कें, बिजली के खम्भे, टेलीफोन के टावर, रेल सारा सरकारी इंफ्रा स्ट्रक्चर गर्व की अनुभूति करवाता है जनवरी से मार्च के महीनो में जब मेरी पूरी तनख्वाह आयकर के रूप में काट ली जाती है,  मेरा यह गर्व थोड़ा बढ़ जाता है जिधर नजर घुमाओ सब अपना ही माल दिखता है


आत्मा में परमात्मा और सकल ब्रम्हाण्ड में सूक्ष्म स्वरूप में स्वयं की स्थिति पर जबसे चिंतन किया है, गणित के इंटीग्रेशन और डिफरेंशियेशन का मर्म समझ आने लगा है इधर शेयर बाजार में थोड़ा बहुत निवेश किया है, तो  जियो के टावर देखता हूं तो फील आती है अरे अंबानी को तो अपुन ने भी उधार दे रखे हैं पूरे दस हजार बैंक के सामने से निकलता हूं तो याद आ जाता है कि क्या हुआ जो बोर्ड आफ डायरेक्टर्स की जनरल मीटींग में नहीं गया, पर मेरा भी नगद बीस हजार का अपना शेयर इंवेस्टमेंट, है तो सही इस बैंक की पूंजी में, बाकायदा डाक से एजीएम की बैठक की सूचना भी आई ही थी कल ओएनजीसी के बांड की याद आ गई तो लगा अरे ये गैस ये आईल कंपनियां सब अपनी ही हैं सूक्ष्म स्वरूप में अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई बरास्ते म्युचुएल फंड देश की रग रग में विद्यमान है मतलब ये सड़के ये पुल सब मेरे ही हैं गर्व से मेरा मस्तक आसमान निहार रहा है पूरे तैंतीस प्रतिशत टैक्स डिडक्शन का रिटर्न फाइल करके लौट रहा हूं बेटा अमेरिका में ३५ प्रतिशत टैक्स दे रहा है और बेटी लंदन में, हम विश्व के विकास के भागीदार हैं, गर्व क्यो न करें

Comments

चर्चित रचना

बाढ़ से बचाव के लिये नदियां गहरी की जावें

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र पानी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। सारी सभ्यतायें नैसर्गिक जल स्रोतो के तटो पर ही विकसित हुई हैं। बढ़ती आबादी के दबाव में , तथा ओद्योगिकीकरण से पानी की मांग बढ़ती ही जा रही है। इसलिये भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है और परिणाम स्वरूप जमीन के अंदर पानी के स्तर में लगातार गिरावट होती जा रही है। नदियो पर हर संभावित प्राकृतिक स्थल पर बांध बनाये गये हैं। बांधो की ऊंचाई को लेकर अनेक जन आंदोलन हमने देखे हैं। बांधो के दुष्परिणाम भी हुये , जंगल डूब में आते चले गये और गांवो का विस्थापन हुआ। बढ़ती पानी की मांग के चलते जलाशयों के बंड रेजिंग के प्रोजेक्ट जब तब बनाये जाते हैं।  रहवासी क्षेत्रो के अंधाधुन्ध सीमेंटीकरण , पालीथिन के व्यापक उपयोग तथा कचरे के समुचित डिस्पोजल के अभाव में , हर साल तेज बारिश के समय या बादल फटने की प्राकृतिक घटनाओ से शहर , सड़कें बस्तियां लगातार डूब में आने की घटनायें बढ़ी हैं। विगत वर्षो में ...

तन्हा-तन्हा सा हूँ मैं

कुमार किशन कीर्ति भीड़ में भी तन्हा हूँ महफिल में भी अकेला हूँ मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ जीवन की कुछ इच्छाए अधूरी हो गई हैं जैसे मेरी प्रेयसी मुझसे दूर हो गई है अंधेरों में भी उजालों की तलाश करता हूँ अपनी अतीत में भी कभी खो जाता हूँ मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ तन्हाई से अब मुझे प्यार हो गया है जैसे, किसी शराबी को मदिरा भा गया है जीवन की सच्चाई अब समझ में आने लगी है किसी 'और' के बिना जिंदगी सुनी-सुनी हो गई है मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ

नीरव प्रतिध्वनि

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी हॉल तालियों से गूँज उठा, सर्कस में निशानेबाज की बन्दूक से निकली पहली ही गोली ने सामने टंगे खिलौनों में से एक खिलौना बतख को उड़ा दिया था। अब उसने दूसरे निशाने की तरफ इशारा कर उसकी तरफ बन्दूक उठाई। तभी एक जोकर उसके और निशानों के बीच सीना तान कर खड़ा हो गया।   निशानेबाज उसे देख कर तिरस्कारपूर्वक बोला, "हट जा।" जोकर ने नहीं की मुद्रा में सिर हिला दिया। निशानेबाज ने क्रोध दर्शाते हुए बन्दूक उठाई और जोकर की टोपी उड़ा दी। लेकिन जोकर बिना डरे अपनी जेब में से एक सेव निकाल कर अपने सिर पर रख कर बोला “मेरा सिर खाली नहीं रहेगा।” निशानेबाज ने अगली गोली से वह सेव भी उड़ा दिया और पूछा, "सामने से हट क्यों नहीं रहा है?" जोकर ने उत्तर दिया, "क्योंकि... मैं तुझसे बड़ा निशानेबाज हूँ।" "कैसे?" निशानेबाज ने चौंक कर पूछा तो हॉल में दर्शक भी उत्सुकतावश चुप हो गए। “इसकी वजह से...” कहकर जोकर ने अपनी कमीज़ के अंदर हाथ डाला और एक छोटी सी थाली निकाल कर दिखाई। यह देख निशानेबाज जोर-जोर से हँसने लगा। लेकिन जोकर उस थाली को दर्शकों को दिखा कर बोला...