डॉ. अंजु लता सिंह
दशभुज देवी ! धन्य हो, वाहन-वाहिनी नार-
अर्जित कर आश्वस्त हो, जीने के अधिकार,
घर बाहर का कार्यभार उठा रही हो खूब-
तेरे इस नव रूप को सबने किया स्वीकार.
मीडिया के हर क्षेत्र में तूने किया धमाल-
लैपटाॅप पर छा रही, 'शक्ति' गजब कमाल,
पाक-कला निष्णात है, बहुरूपी अंदाज-
लाल वसन पहने सजी, सुंदरी उन्नत-भाल
नारी! जगी चेतना तुझमें, पनपा है विश्वास
कला और विज्ञान हुए हैं आज तेरे ही दास
कर ले रे आगाज कर्म का तू कर्मठ बनकर
होगा अति उत्तम अंजाम जीवन भी बेहतर
सिर पर पगड़ी पैर में धोती, रचा पुरूष का स्वांग
आधी दुनिया कहलाती हो, सजी सिंदूरी मांग
मां का चोला पहन भवानी लगती हो अपरूप
जग को सदा सुहाता है बस गाएं तेरा राग
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