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हिंदी के मन की बात

सिद्धार्थ सरावत


संस्कृत की बेटी मैं हिन्दी, भारत की एक भाषा हूँ
अपनो ने ठुकराया मुझको, गैरों की अभिलाषा हूँ

मूल रूप से विलग हुई, मैं दूजे प्रारूपों में चली गई
निज अस्तित्व-रक्षा में, मैं पग-पग पर हूँ छली गई

मीठी बोली अद्भुत वाणी, मैं एक प्रेम पिपासा हूँ
तुम्हे नहीं है आशा मुझसे, उनकी मैं जिज्ञासा हूँ

यद्यपि मैं भारत के एक, बड़े वर्ग में बोली जाती हूँ
फिर भी अंग्रेजी के आगे, कमतर तोली जाती हूँ

थामके दामन उसका तुमने, मुझसे नाता तोडा है
संस्कृति और संस्कार को, क्षणभर तुमने छोड़ा है

सीखो कोई भी भाषा, पर मेरी भी कुछ आशा है
मुझे छोड़ तुम उसको बोलो, मेरी यही निराशा है

शिक्षा तो देती ही हूँ, अब तो रोजगार भी देती हूँ
एक बार अपनाकर देखो, कितना प्यार मैं देती हूँ

पढ़ो लिखो और बोलो, मुझसे प्रेम बढ़ाकर देखो
हृदयस्पर्शी सहज सरल हूँ, ये मुझे अपनाकर देखो

राजभाषा तो बनी हूँ मैं, कब राष्ट्रभाषा बन पाऊंँगी 
क्षेत्रीयता और राजनीति से, कब ऊपर उठ पाऊँगी

आशा है कभी तो कोई, एक ऐसा दिन भी आएगा
जब भारत का बच्चा बच्चा, बस हिंदी अपनाएगा

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