विवेक रंजन श्रीवास्तव
राजेन्! एक सम्पन्न मध्यम वर्गीय परिवार का इकलौता बेटा, बहनों का दुलारा भैया। कुशाग्र बुद्धि, चिंतनशील और बेहद संवेदनशील हृदयवाला व्यक्तित्व . एक व्यस्त महानगर का निवासी महानगर जहां आदमी की पहचान, पता उसके नाम से नहीं, नंबर से होती है। जहां आदमी घड़ी के कांटो के साथ, उन्हीं की तरह, घूमता रहता है, अपने में, अपने लिये। डायरी में होते है, चंद टेलीफोन नंबर, एपाइंटमेंट्स और सिर्फ इस या उस तरह व्यस्त तारीख। जहां एक ही बिल्डिंग के दो फ्लैट्स में रहनेवाले, आधुनिकता की चादर लपेटकर एक दूसरे से अंजान बने रहते हैं। बसों, मैट्रो, स्कूटरों की तेज भागदौड़, कारखानों के भोपुओं का शोर , नियान लाइट की चकाचैंध और हाय! हलो! कि संस्कृति में ढली औपचारिकता । धन की दौड़ में दौड़ते पति पत्नी भी जहां चैटिंग के जरिये साथ रह पाते हैं।
राजेन् के पापा एक सरकारी अफसर हैं । उनका अपना एक फ्लैट है।जिसमें हाय गूगल की ध्वनि पर स्मार्ट सिस्टमस को नियंत्रित करता एलिक्सा, उनका निजी परिचारक है . विज्ञान सुलभ सभी नवीनतम सुविधायें उनके पास हैं।
बचपन से बिरला व्यक्तित्व था, उसका । भिखारी को देख वह पूछता , मम्मी वो भीख क्यों मांगता है? मम्मी के भुलावे वाले उत्तर उसे संतुष्ट न कर पाते। झोपड़पट्टी की झुग्गियां, उसके यहां काम पर आने वाले नौकर, फुटपाथ पर उसकी ही उम्र का जूतों पर पालिश करता बच्चा-बचपन से ही राजेन के अनुत्तरित प्रश्न चिन्ह बनते गये । न जाने कैसे उसके हृदय में समाज सुधारक की एक छवि बन गई थी कि जब कोई उससे पूछता बड़े होकर क्या बनोगे? तो वह सामान्य बच्चों से बिल्कुल अलग जवाब देता मैं समाज सुधारक बनूंगा।
वही नन्हा राजेन, आज युवा इंजीनियर राजेन वर्मा है। प्रथम श्रेणी में हायर सेकेंडरी करने के पष्चात् पापा की इच्छानुसार आज्ञााकरी बेटे ने इंजीनियरिंग में प्रवेश ले लिया था। इसके साथ ही उसकी समझ विकसित हुई, चिंतन का आयाम विस्तृत हुआ। अनुत्तरित यक्ष प्रश्नो की संख्या बढ़ी। उसका उत्साह उससे कहता आओ, इंजीनियरिंग कालेज में बंधकर तुम नहीं रह सकते, बाहर आओ, सबके लिये जियो, कुछ करो, ढूढों अपने सवालो के जबाब । लेकिन तभी उसका अपना अंतरमन उससे यह भी पूछता- पगले। समाज सुधारक बनकर क्या घास खाओगे? और फिर जब तक तुम अपनी योग्यता सिद्ध न कर दोगे, तुम्हारे विचारों को मानेगा कौन? समाज सुधारक नेता बनकर तुम क्या करोगे? भाषण दोगे । यही ना , भाषणों से समाज नहीं सुधरते। और फिर मम्मी-पापा की तुम पर टिकी आशाओं का क्या होगा ? क्या तुमने ढेरों समाज सुधारक संस्थाओं, व्यक्तियों को खुद विवादास्पद नहीं पाया है।
राजेन का दिल रो उठता। उसे एक घुटन का अहसास होता । किंकर्तव्य विमूढ़ वह अपने आप से लड़ने लगता, उसे अपने सपने ढहते नजर आते। औरों की तरह वह सिर्फ अपने लिये नही जीना चाहता था, वह घंटो पुस्तकालय में अपनी समस्याओं के समाधान का व्यर्थ प्रयत्न करता, हर पुस्तक एक चोट करती , उसके विचारों से छेड़खानी करती, हर शब्द एक समस्या बनकर उसे घेर लेता। उस दिन वह पापा के आफिस के बड़े बाबू की लड़की की शादी में गया था। वहां शहनाई के मधुर स्वर, सजे धजे व्यस्त लोग, रोशनी से नहाया आवास, सभी कुछ बहुत सम्मोहक, बहुत अच्छा लग रहा था। पर राजेन सोच रहा था, कि क्या ऐसे आयोजनों के अवसर पर फिजूल खर्ची न करने के उपदेशात्मक वाक्य महज रेडियो पर प्रसारण के लिये ही है? अभी वह किसी निष्कर्ष पर पहुंचा भी न था कि शहनाई की गूंज रूक गई, भाग दौड़ के बीच पता चला कि लड़की के पिता को दिल का दौरा पड़ गया था, कारण था दहेज। लड़के वाले तब तक बारात लगाने को तैयार नहीं थे। जब तक करार के अनुरूप दहेज न हो। उस विचित्र स्थिति में वह एक कोने उपेक्षित सा खड़ा था एक और प्रश्न चिन्ह इसके मस्तिष्क को कुरेद रहा था। दहेज से होने वाली मौतें और न हो सकने वाली शादियां उससे सवाल कर रहीं थी और वह अनुत्तरित था।
राजेन अखबार पढ़ता तो उसकी नज़रें अटक जाती उन खबरों पर जिनमें अशिक्षा के कारण ठगी की वारदातें होती है-उसे प्रौढ़ शिक्षा का महत्व और आवश्यकता महसूस होती । जब वह बढ़ती जनसंख्या के आंकड़े देखता तो परिवार कल्याण कार्यक्रम के क्षेत्र में करने को उसे ढेर सा काम दिखता। सड़क चलते जब वह छींटाकशी और अवारा मजनुओं की ऊलजलूल हरकतें देखता तो चरित्र निर्माण की ओर उसका ध्यान जाता। नैतिक शिक्षा की अनिर्वायता पर वह सोचता।
समस्याओं के ढेर में उलझती, टूटती डोर का सिरा पकड़ने के भटकाव के बीच अपनी भावनाओं को वह कविता कहानियों में अभिव्यक्त करने लगा। जब लोग उसके यथार्थ बोध चित्रण पर वाह वाह करते तो वह मन ही मन रोता।
अपनी विवषता के साथ राजेन ने एक समझौता कर लिया था। उसने मान लिया था कि समाज में सच्चे सुधार के लिये उसकी हर इकाई, जो जहां है वहीं ‘अपन‘ के साथ- साथ ‘सबके लिये‘ भी जिये। हम सुधरेंगे तभी जग सुधरेगा। उसने अपने स्तर पर ही स्व के साथ-साथ समाज के लिये भी जीने का संकल्प लेकर अपने आप को समझा लिया था।
संयोगवश कहिये या भ्रष्ट व्यवस्था के पुरस्कार स्वरूप राजेन का पहला पदांकन एक सुदूर गांव मे हुआ था। क्योंकि वह जानता था आज मन चाही जगह पर तो उसकी पोस्टिंग ही होती है जिसे किसी अधिकारी या राजनीतिज्ञ का प्रश्रय प्राप्त हो। जो भी हो राजेन अपनी इस गांव की पोस्टिंग से प्रसन्न था उसे खुशी थी कि इससे वह गांव की उन समस्याओं को अनुभव कर सकेगा जिनके विषय में अब तक उसने सिर्फ पढ़ा था। व्यवसायिक जीवन में प्रवेश की तैयारियों में व्यस्त राजेन में एक नव स्फूर्ति का संचार सा हो रहा था।
मम्मी - पापा और इसकी उसकी मित्र मंडली स्टेशन तक छोड़ने आये थे। देर तक मम्मी हिदायतें देती रहीं थी। सिर्फ वाटर फिल्टर का पानी पीने से लेकर मोबाईल में टच में बने रहने की और न जाने क्या क्या। वह प्रसन्नचित उन्हें चिंता न करने के लिये आश्वस्त करता रहा था। उसके मित्र आश्चर्य कर रहे थे कि स्टोनवाश जीन्स पहनने वाला राजेन कैसे एक पुअर विलेज में जाते हुये भी खुश है? हाऊ ही विल एकोमोडेट ? पापा कह रहे थे कि वे जल्दी ही उसका तबादला वापिस यहीं करवाने के लिये ट्राई करेंगे और फिर सिग्नल हुआ था देर तक वह सरकती ट्रेन से बिदा के हिलते हाथों के प्रत्युत्तर में हाथ हिलाता रहा था और गांव के सपने बुनता रहा था। अपने अध्ययन और कल्पनाओं के ताने बानों से।
छत्तीस घंटो की थका देने वाली यात्रा के बाद रामपुर में प्रथम श्रेणी के डिब्बे से उतरने वाला वह अकेला ही यात्री था। संभवतः उसकी वेषभूषा और एरिस्ट्रोकेटिक सामान से ही अनुमान लगाकर देवेंन्द्र बाबू उस तक आये थे और डरते से पूछा था सर आप बंबई के इंजी. वर्मा? हां हां? उसने कहा था . सर मैं देवेंद्र आपका बड़ा बाबू सर . आपकी व्हाट्स अप दीपी से पहचान लिया सर आपको . और उसका सामान जीप पर रखा जाने लगा। सामान उठाते मजदूर के फटे कपड़ों में रह रहकर अटकती अपनी नजरों को सप्रयास रोककर राजेन , देवेंद्र बाबू से सफर का किस्सा कहता रहा और फिर कच्ची सकरी सी सड़क पर जीप दौड़ी थी और इस दो कमरों वाले विश्रामगृह तक आते , राजेन को गांव की हरियाली में पनपते अपनत्व भाईचारे और सौहार्द्र का कुछ आभास हुआ था। सड़क के दोनों ओर कांटों की बाड़ के भीतर गन्ने के ऊँचे पौधे उसे बहुत अच्छे लग रहे थे। बिना किसी पूर्व परिचय के जै राम जी करते लोग, जिनकी आंखों में कौतूहल का भाव था, कच्चे गोबर से लिपे मकान, जानवरों के गले में बंधी घंटियों की आवाज, बैलगाड़ियों की चूं चरर चूं और इस सबके बीच होते विकास कार्य ग्राम पंचायत, स्कूल, प्राइमरी हैल्थ सेंटर, सहकारी दूकान, ग्रामीण बैंक इन सबसे वह जल्दी ही परिचित हो गया था।
उसने यहां के आल इन वन एक कोठरी वाले कच्चे घर देखे, अनायास ही उसे अपने फ्लैट की याद आ गई, और वह तुलना करने लगा। गांव और शहर का अंतर. एक ओर निर्मूल्य मानवीय श्रम तो दूसरी ओर मशीनी श्रम का भी जरूरत से ज्यादा मूल्य। कहां रेंगता ग्रामीण जीवन और कहां लंबी सपाट काली सड़कों पर वेग की सीमायें लाघंती आधुनिकता। चिकटे चिथडे़ लिबासों में लिपटे लोगों को भी अच्छे कपड़ों की जरूरत है, यही नहीं उन्हें उनकी जरूरत महसूस भी हमें ही करानी है, अच्छे कपड़े महज उपलब्ध करा देने भर से काम नहीं चलेगा, उन्हें साफ रखने की आवश्यकता भी हमें ही उन्हें समझानी है।
राजेन को याद है, दो दिनों तक कारपोरेशन के नलों में पानी न आने पर कितनी पेपर बाजी हुई थी संसद तक मे हो हल्ला हुआ था, और यहां वह देख रहा है गांव की पनिहारिनें 2-2 मील से पानी के घड़े लाती हुई । सच एक अपराध भाव से उसकी नजरें खुद झुक गई।
खेतों तक बिजली के पंप और लट्ओं का प्रकाश लाने के ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का कार्य उसके निर्देशन में जारी है, इसका उसे संतोष है। गांव की हवा में उसे शहर सी धुंये की नहीं मिट्टी की गंध आती है, जिसमें सांस लेना उसे भाने लगा। पर यह बात कैसे समझाये, प्राइमरी हैल्थ सेंटर के उस डाक्टर को, ग्रामीण बैंक के उस मैनेजर को, स्कूल के उस मास्टर को जो उसे मूर्ख कहते हैं, पढ़ लिखकर गांव में क्या सड़ना? इसीलिये ये सब पास के कस्बे मे रहते हैं और उसका ही वह देवेन्द्र बाबू जिसके अनुसार गांव में रहकर भी चार पैसे नहीं कमाये तो क्या किया? कैसा दोहन हो रहा है व्यवस्था का ?क्यो पल रहा है भ्रष्टाचार ? अपने हाथों में अपना स्थानांतरण आदेश लिये सोच रहा है राजेन । कौन जाने यह स्थानांतरण उसके पापा का प्रयास है या गांव के विकास के नाम पर व्यवस्था के दोहन और शोषण की परिस्थितियों में समझौता न करने के कारण उसके अफसरों और अधीनस्त् कर्मचारियों की शिकायत का परिणाम।
जो भी हो ये तो नौकरी है, उसे अपना मिशन अधूरा छोड़कर जाना ही पडे़गा- उफ वह उद्वेलित हो उठता है विचारों का झंझावत उसे झकझोर रहा है एक के बाद एक यक्ष प्रश्न उभर, रहे हैं- दहेज ग्रमोत्थान, गंदी बस्ती उन्मूलन, चरित्र निर्माण, प्रौढ़ शिक्षा , भ्रष्टाचार ,समस्याओं के समाधानहीन पहाड़ अनुत्तरित प्रष्नचिन्हों के साथ यक्ष प्रश्नो का अम्बार।
Comments
Post a Comment