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दुर्गा पूजा और दशहरा

सिद्धार्थ सरावत


शक्ति रूप की मूरत पूजे
साक्षात का करे शमन है
घर-घर मूरत सजी हुई हैं
सूरतों को मिला कफ़न है

अंतरात्मा है व्यूहल इनकी
ना कर्म ही इनके पावन है
जो साक्षात हैं दिख जाते हैं
कुछ राम के भेष में रावण हैं

खुद ही खुद का पुतला फूंके
एक आनन में सौ आनन हैं
तामस मन अधर्मी चितवन
नित अमित रुप बनावन हैं

राम चरित्र दुर्लभ है जग में
पग-पग पर पापी जीता है
कुछ पल हैं आदर्श की बातें
कहाँ दिखती अब माँ सीता है

निज दोषों को किसने जीता
किसने उनका किया दमन है
फिर से एक त्यौहार की खातिर
अग्नि में एक पुतला अर्पण है

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चर्चित रचना

बाढ़ से बचाव के लिये नदियां गहरी की जावें

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र पानी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। सारी सभ्यतायें नैसर्गिक जल स्रोतो के तटो पर ही विकसित हुई हैं। बढ़ती आबादी के दबाव में , तथा ओद्योगिकीकरण से पानी की मांग बढ़ती ही जा रही है। इसलिये भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है और परिणाम स्वरूप जमीन के अंदर पानी के स्तर में लगातार गिरावट होती जा रही है। नदियो पर हर संभावित प्राकृतिक स्थल पर बांध बनाये गये हैं। बांधो की ऊंचाई को लेकर अनेक जन आंदोलन हमने देखे हैं। बांधो के दुष्परिणाम भी हुये , जंगल डूब में आते चले गये और गांवो का विस्थापन हुआ। बढ़ती पानी की मांग के चलते जलाशयों के बंड रेजिंग के प्रोजेक्ट जब तब बनाये जाते हैं।  रहवासी क्षेत्रो के अंधाधुन्ध सीमेंटीकरण , पालीथिन के व्यापक उपयोग तथा कचरे के समुचित डिस्पोजल के अभाव में , हर साल तेज बारिश के समय या बादल फटने की प्राकृतिक घटनाओ से शहर , सड़कें बस्तियां लगातार डूब में आने की घटनायें बढ़ी हैं। विगत वर्षो में ...

तन्हा-तन्हा सा हूँ मैं

कुमार किशन कीर्ति भीड़ में भी तन्हा हूँ महफिल में भी अकेला हूँ मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ जीवन की कुछ इच्छाए अधूरी हो गई हैं जैसे मेरी प्रेयसी मुझसे दूर हो गई है अंधेरों में भी उजालों की तलाश करता हूँ अपनी अतीत में भी कभी खो जाता हूँ मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ तन्हाई से अब मुझे प्यार हो गया है जैसे, किसी शराबी को मदिरा भा गया है जीवन की सच्चाई अब समझ में आने लगी है किसी 'और' के बिना जिंदगी सुनी-सुनी हो गई है मुझे नहीं पता मैं ऐसा क्यों हूँ बस, उसके बिना तन्हा-तन्हा सा मैं हूँ

नीरव प्रतिध्वनि

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी हॉल तालियों से गूँज उठा, सर्कस में निशानेबाज की बन्दूक से निकली पहली ही गोली ने सामने टंगे खिलौनों में से एक खिलौना बतख को उड़ा दिया था। अब उसने दूसरे निशाने की तरफ इशारा कर उसकी तरफ बन्दूक उठाई। तभी एक जोकर उसके और निशानों के बीच सीना तान कर खड़ा हो गया।   निशानेबाज उसे देख कर तिरस्कारपूर्वक बोला, "हट जा।" जोकर ने नहीं की मुद्रा में सिर हिला दिया। निशानेबाज ने क्रोध दर्शाते हुए बन्दूक उठाई और जोकर की टोपी उड़ा दी। लेकिन जोकर बिना डरे अपनी जेब में से एक सेव निकाल कर अपने सिर पर रख कर बोला “मेरा सिर खाली नहीं रहेगा।” निशानेबाज ने अगली गोली से वह सेव भी उड़ा दिया और पूछा, "सामने से हट क्यों नहीं रहा है?" जोकर ने उत्तर दिया, "क्योंकि... मैं तुझसे बड़ा निशानेबाज हूँ।" "कैसे?" निशानेबाज ने चौंक कर पूछा तो हॉल में दर्शक भी उत्सुकतावश चुप हो गए। “इसकी वजह से...” कहकर जोकर ने अपनी कमीज़ के अंदर हाथ डाला और एक छोटी सी थाली निकाल कर दिखाई। यह देख निशानेबाज जोर-जोर से हँसने लगा। लेकिन जोकर उस थाली को दर्शकों को दिखा कर बोला...