सिद्धार्थ सरावत
शक्ति रूप की मूरत पूजे
साक्षात का करे शमन है
घर-घर मूरत सजी हुई हैं
सूरतों को मिला कफ़न है
अंतरात्मा है व्यूहल इनकी
ना कर्म ही इनके पावन है
जो साक्षात हैं दिख जाते हैं
कुछ राम के भेष में रावण हैं
खुद ही खुद का पुतला फूंके
एक आनन में सौ आनन हैं
तामस मन अधर्मी चितवन
नित अमित रुप बनावन हैं
राम चरित्र दुर्लभ है जग में
पग-पग पर पापी जीता है
कुछ पल हैं आदर्श की बातें
कहाँ दिखती अब माँ सीता है
निज दोषों को किसने जीता
किसने उनका किया दमन है
फिर से एक त्यौहार की खातिर
अग्नि में एक पुतला अर्पण है
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