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ख़ुदकुशी (लघुकथा)

पूजा गुप्ता  (प्रीत) 



आकाश और अनु  झगड़े बढ़ते ही जा रहे थे। आजकल आकाश रोज़ ही लेट आता। घर-बाहर सब कुछ अकेले सँभालते अनु भी चिढ़-चिढ़ी सी हो गयी थी। कल जब वो बच्चों के स्कूल की कुछ  बात करने बैठी तो, आकाश बिना बात ही उस पर चिल्ला दिया। बच्चों के सामने आकाश का यूँ डाँटना अनु को बहुत बुरा लगा। सुबह के सारे काम जल्दी से पूरे किऐ।  बच्चो के स्कूल जाते ही उसने गैस बंद किया और बाहर सोफे पर जाकर बैठ गयी। उसने कल रात ही फैसला कर लिया था की अब और नहीं जीना है। तंग आ चुकी थी वो इस रोज़ रोज़ की  किचकिच से। उसने अपनी अलमारी से एक दुपट्टा निकला और फंदा बनाना शुरू किया।  पंखे की ऊंचाई कुछ ज्यादा लगी और दुपट्टा छोटा। उसने दूसरा बड़ा दुपट्टा निकाला और उसे देख कर याद आया की ये तो आकाश ने पिछली एनिवर्सरी पर गिफ्ट दिया था। ये नहीं कोई और देखना पड़ेगा, ये तो कितने प्यार से लाये थे वो। ये सब सोच ही रही थी की अचानक डोर बेल की आवाज़ आयी दरवाज़ा खोला तो सामने काम वाली गीता खडी थी रोज़ की तरह मुँह लटकाये वो अंदर आगयी। पहले तो अनु ने सोचा की इसको छुट्टी दे दूँ।

फिर सोचा जब वो मर जाएगी तो बहुत लोग घर आएंगे। क्या सोचेंगे घर भी साफ़ नहीं रखती। उसने गीता को सफाई का काम समझाया, फिर ख्याल आया की कपडे भी बहुत पड़े हैं धुलने के। बेचारे बच्चे उसके जाने के बाद क्या क्या करेंगे और रिश्तेदार तो कोई हिल कर पानी भी ना पियेगा। यही सब सोच कर मशीन ऑन कर दी कपडे धुलने डाले और बाहर आयी; सोचा अब आराम से मरूंगी। घर भी साफ़ कपडे भी धुले हुए। एक नज़र किचन पर डाली तो याद आया की रात की जमाई दही तो फ्रिज  में रखना ही भूल गयी। दही रखने को फ्रिज खोला तो मेथी पर नज़र पड़ गयी सोचा मेथी तो साफ़ कर ही दूँ ।कोई और तो करने वाला नहीं। मेथी लेकर बैठी तो पास आकर गीता भी बैठ गयी। उसके चेहरे पर बड़े चोट के निशान थे, पूछने पर बोली क्या बताये दीदी रोज़ का काम है पीकर आना और मारना। अब कब तक रोती रहुँ। मैंने तो अब ध्यान देना भी छोड़ दिया है। 
कपडे सूखने डाल कर गीता चली गयी। अनु ने मेथी को साफ़ कर  फिज़ में  रखा और किचन साफ़ किया। बच्चो क खाने का सब सामान - दिन का खाना और शाम का नाश्ता टेबल पर रखा। सोचा अब चैन से मर सकती हूँ। घर भी ठीक है और किचन भी। तभी केलेन्डर  पर नज़र गयी इस सैटरडे तो बच्चों  की स्कूल मीटिंग हैं। आकाश को तो कुछ  याद रहता नहीं, सब उसी को याद रखना पड़ता है। आकाश को तो ये भी नहीं पता की बच्चे क्या खाते हैं क्या नहीं। सब उसी की जिम्मेदारी है; जैसे उसके अकेले के बच्चे हों। केलेन्डर में धोबी का हिसाब दूध वाले का हिसाब भी लिखा था। उसने दोनों का अब तक का हिसाब जोड़ा और पेपर पर लिख कर टीवी के पास रख दिया। चारो तरफ नज़र डाली अब सब कुछ ठीक लग रहा था। परफेक्ट अब वो आराम से मरेगी। इतना सब कर के अनु को थोड़ी थकान सी हो गयी। सुबह नाश्ता भी नहीं किया था। उसने सोचा मरना तो है ही तो क्यों न पहले एक अदरक वाली चाय हो जाये। किचन में जाकर चाय बनने रखी और डब्बे सी अपनी पसंद के चॉक्लेट क्रीम बिस्कुट निकाल कर एक प्लेट में रख लिए। उसे चॉक्लेट बिस्कुट कितने पसंद थे पर बच्चों के चक्कर में कभी खुद खा ही नहीं पाती थी। आज तो सारा पैकेट वही खायेगी ।चाय  लेकर सोफे पर बैठी आराम से चाय पी, सारे बिस्किट ख़तम किये, अब कुछ ठीक लग रहा था। अपने कपड़ो को देखा तो सोच में पड़ गयी कितना पुराना सूट पहन रखा है। अब ऐसे भी कोई मरता है क्या। अलमारी से एक अच्छा सा सूट निकाल कर पहन लिया। बाल भी ठीक किये। अपना चेहरा देखा तो याद आया कब से पार्लर नहीं गयी थी। हल्का सा मेकअप किया। हाँ अब सब ठीक है । सामने पड़ी नयी नेल पेंट देखी तो सोचा लगा ही लूँ। आगे किसके काम आएगी। आराम से बैठ कर नेल पेंट लगायी। बस अब ये सूख जाए तो फिर फंदा लगाए। तभी डोर बेल बज गयी। उफ़!! अब कौन आया .. लोग तो सुकून से मरने भी नहीं देते। दरवाज़ा खोला तो सामने मुस्कुराते हुए आकाश खड़े थे। अनु सोच में पड़ गयी। इस वक़्त घर कैसे आगये सब ठीक तो है ना? आकाश उसे गले लगते हुए बोला - "अब मेरी इतनी प्यारी बीवी कल से रूठी है, मानाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा ना। अब जल्दी से आकर टेबल पर बैठो, तुम्हारी फेवरिट पाव भाजी लाया हूँ। आज लंच साथ करते हैं। अच्छा वैसे ये तो बताओ आज इतना तैयार होकर कहाँ जा रहीं थी .. अब आकाश को क्या बताये की वो मरने जा रही थी। साथ लंच किया। कुछ ही देर में बच्चे भी आगये। मम्मी पापा को साथ देख दोनों ख़ुशी से चहक उठे। लंच के बाद कुछ देर रेस्ट किया और फिर सब घूमने निकल गए। इन सबके बीच अनु ने दुपट्टे का फंदा खोला और मुस्कुराते हुऐ तह करके वापस अलमारी में रख दिया।

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